Friday, December 2, 2016

Khalanga Fair 2016: Showcasing Gorkha Culture

DEHRADUN: Celebrating over 200 years of Gorkha's valour in the historic battle of Khalanga, the two-day annual event concluded in the state capital on Sunday with food fest and cultural programmes. A delegation of retired personnel from British army Gorkhas, who are now residing in Nepal, visited the festival.

The event is organised by Gorkhali Sudhar Sabha, an apex non-political body in Dehradun that works for the uplift of the Gorkha community in the state. Every year, the community celebrates the battle of Khalanga by holding a big get-together at Nalapani, the hilltop on the eastern fringe of Dehradun, where the Gorkha army fought a fierce battle against the British army in October, 1814.

"The festival is held to commemorate the Anglo-Gorkha war where nearly 600 warriors used guerrilla warfare technique for a month to defeat the British. However, the Gorkhas lost but till today they are remembered for their bravery," said anthropologist Lokesh Ohri.

Madhu Gurung, who has penned a book on Khalanga war, said, "The British had to multiply the strength of their soldiers from 10,000 to 30,000 and cut water supply of the zone where Gorkhas operated, in order to win the war . However, the British, too, were impressed as even Gorkha women fought the battle with children tied to their back. The brave women hacked their enemies to death with dagger. In fact, the British erected a memorial as a tribute."
Located 5 km from the hill capital at Sahastradhara Road, Khalanga War Memorial is a famous tourist spot. It is believed to be world's first memorial constructed by an army for its opponent. The dagger, known as 'khukhri', also became a symbol of Gorkha bravery.

According to Ram Thapa, president of the committee formed to organise the mega event, chief minister Hraish Rawat announced a grant of Rs 5 lakh for the annual festival. "Former chief minister Ramesh Pokhriyal Nishank had also announced a grant five years ago, but we only get half the amount every year. Nishank had also allotted Rs 50 lakh to maintain the area for development of eco-tourism, however, no amount has been sanctioned till date. Except for a sitting arrangement near Sagar Tal by forest department, no work has been done so far," Thapa said.

He demanded security for Khalanga War Memorial as he said that it has been damaged by some anti-social elements. Thapa also requested to repair the old Chander Narayani temple in the vicinity.
(Article Credit: Seema Sharma, Times of India; Representational Image)

Sunday, November 27, 2016

42वां खलंगा मेला 2016

बलभद्र खलंगा विकास समिति द्वारा 42 वां खलंगा मेला धूमधाम से मनाया गया। गोरखा व अंग्रेजों के बीच 1814 में हुई निर्णायक युद्ध के गोरखा सेनानायक बलभद्र थापा की याद में हर साल इस उत्सव को मनाया जाता है।

रायपुर स्थित चंद्रयानी मंदिर सागरताल में बलभद्र स्मारक के नजदीक पूरे दिन रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहे। खलंगा के जंगल में मेले जैसा माहौल रहा। खेल मंत्री दिनेश अग्रवाल, डोईवाला विधायक हीरा सिंह बिष्ट, रायपुर के पूर्व विधायक उमेश शर्मा काऊ ने अपने सम्बोधन में गोरखाओं के गौरवशाली इतिहास का जिक्र करते हुए मेले को भव्य स्वरूप देने के लिए समिति को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। वहीं मेले में पारम्परिक गोर्खाली पकवान के अनेक स्टॉल पर लोगों की भीड़ उमड़ी हुई दिखी। समिति की ओर से मेले का आनंद लेने आए लोगों के लिए वन भोज की व्यवस्था थी। वहीं मेले से एक दिन पूर्व चंद्रयानी मंदिर में हवन पूजन, कीर्तन के बाद भंडारा आयोजित किया गया। मेले का समापन लक्की ड्रा से किया गया। मेला समिति अध्यक्ष राम सिंह थापा के नेतृत्व में समिति पदाधिकारियों ने बलभद्र युद्ध स्मारक पर पुष्पमाला चढ़ाकर आंग्ल-गोरखा युद्ध के वीरों को नमन किया। मेला समिति ने सागरताल को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की अपनी मांग मुख्य अतिथि के सामने रखी। वहीं मेला समिति द्वारा खलंगा मेले में शिरकत करने आए नेपाली प्रतिनिधिमंडल को भी विशेष तौर पर सम्मानित किया गया। (प्रतिनिधि छायाचित्र)

Sunday, November 20, 2016

यस्ता छन् भानुभक्तका कविता

विक्रम संवत १८७१ असार २९ गते तनहुँको चुँदीरम्घामा आचार्य जन्मनुभएको थियो । संस्कृत भाषाको रामायणलाई नेपाली भाषमा लेखेर भानुभक्तले नेपाली साहित्य र भाषामा महत्वपूर्ण योगदान गर्नुभएको छ । उहाँको प्रश्नोत्तर, भक्तमाला, रामगीता जस्ता उत्कृष्ट कृति र फुटकर कविता पनि उत्तिकै चर्चित छन् ।

भानुभक्तका केही कविता यस्ता छन्:


एक् दिन् नारद् सत्य लोक् पुगिगया लोक्को हित् गरौ भनि

ब्रम्ह्ना ताहि थिया पर्या चरगनमा खुसि गराया पनि

क्या सोद्च्हौ तिमी सोध् म भन्च्हु म भनि मर्जि भयेथ्यो जसै

ब्रम्ह्नाको करुना भुजेर रिसिले बिन्ति गर्या यो तसै।

हे ब्रम्ह्ना जति हुन् सुभा सुभ सबै सुनि रया छु कछु 

बाकि छइन तथा बिसुन्न इछया म यो गर्द्छु

आउ लाज भयो कलि बखतम प्रानि दुराच्रार भइ

गर्न्याछन सब पाप् पनि सरलका निस्काम तिमा गइ ।

साच्ह्यो कुरा गरि नकोइ अरुकोइ गर्नन् त निन्दा पनि

अर्कको धन खानलाई अभिला गर्नन् तद यो भनि

कोहि जान् परत्रिमा रतहुनन कोही त हिम्सा महा

दिनइलाई त अत्मा जानि रहलान् नत्तिक पसु झहि कहा ।


2.

भर् जन्म घाँस तिर मन् दिई धन कमायो

नाम क्यै रहोस् पछि भनेर कुवा खनायो

घाँसी दरिद्र घरको तर बुद्धि कस्तो

म भानुभक्त धनी भैकन किन यस्तो

मेरा ईनार न त सत्तल पाटिकै छन्

जे धन चीजहरु छन् घर भित्रनै छन्

त्यस घाँसीले कसरी आज दिए छ अर्ति

धिक्कार हो म कन बस्नु न राखि किर्ति


3.

एक् मन् चित्त लगाइ चाकरि गर्याँ खूसी भया छन् हरि।

मान्माथी पनि भुक्तमान् थपिदिया कैल्यै नछुट्न्या गरी।

रोज् रोज् दर्शन पाउँछू चरणको ताप् छैन मन्मा कछू।

रात् भर् नाच् पनि हेर्छु खर्च नगरी ठूला चयन्मा म छु।

लामखुट्टे उपियाँ उडुस् इ सँगि छन् इन्कै लहड्मा बसी।

लाम्खुट्टेहरु गाउँछन् इ उपियाँ नाच्छन् म हेर्छु बसी।

बिन्ती डिट्ठा विचारीसित म कति गरूँ चुप् रहन्छन् नबोली।

बोल्छन् ता ख्याल् गर्या झैं अनि पछि दिनदिन् भन्दछन् भोलि भोली।

की ता सक्तीन भन्नू कि तब छिनिदिनू क्यान भन्छन् यि भोलि।

भोली भोली हुँदैमा सब घर बितिगो बक्सियोस् आज झोली ।

स्रोत: इंटरनेट

Monday, October 10, 2016

एउटा कविता: दशैं

गइन् वर्षा नानी खुलुखुलु पखालेर धरती

शरत् हाँस्तै आयो सबसित लगाएर पिरती

सफा चिल्ला राम्रा तरु बनहरू पात हरिया

फलेका छन् नाना फलफुलहरू टम्म रसिला ।

सकी खेती पाती कृषकजनले फुर्सत लिए

घट्यो चर्को गर्मी न त छ सरदी ठिक्क समय

यही मौका पारी घर घर दसैं आगमन भो

खुशीको वेलामा जुरुजुरु यसै नाच्न मन भो ।

 
जगन्माता सृष्टि स्थिति प्रलय गर्ने भगवती

उनै काली वाणी सहित धनलक्ष्मी शुभ गति

गरी पूजा आजा जगमग उमारेर जमरा

यही माग्छौं आमा छर करुणता प्रेम छहरा ।

विदेशै लागेका जन पनि बिदा ली घर फिरे

अनेकौं कोसेली सहित धनलक्ष्मी घर भरे

टिका थाप्छन् ठूला जनसित शुभाशीर्वचन ली

शुभेच्छा है भन्छन् परिचितहरूसाथ निहुरी ।

 
मिठो खाने राम्रो पहिरन लिने यो समय हो

घृणा ईर्ष्या बिर्सी मिलजुल हुने यो समय हो

सबैमा फैलाई विनय समता प्रेम करुणा

दसैं राम्रो पारौं अझ सुख थपौं जीव जगमा ।

- रमेश खकुरेल (स्रोत: ऑनलाइन साहित्य डॉट कॉम)

Saturday, September 24, 2016

Dhaka Topi

Dhaka Topi or traditional Nepali Nepali hat  and the Khukuri are a part of the unique  cultural  identity  of the Gorkhas.  It is a symbol of pride and bonding among the Nepali speaking  people. 

The hat is made of a fabric called dhaka, which is also used for a type of blouse, a dhaka-ko-cholo  which translates "blouse made of dhaka fabric".

The Dhaka topi is so called because the design of the print can be traced to a traditional Jamdani weaving and design style originating in Dhaka,  the capital of Bangladesh.

Dhaka Topis are also given away as gifts during Dashain, Tihar and  Chhath  festivals.

The founder of the Art of Living Sri Sri Ravi Shankar announced March 1st as the Dhaka topi Day in India celebrated by Indian Gorkhas. But in Nepal, 1 January is celebrated as Dhaka topi day.

Friday, September 2, 2016

अब सरकारी पर्व बनेगा गोर्खाली हरितालिका तीज

देहरादून हिन्दुस्तान
29-08-16

गढ़ीकैंट स्थित महिंद्रा ग्राउंड में रविवार को आयोजित गोर्खाली महिला हरितालिका तीज उत्सव के 12वें आयोजन में सीएम रावत ने कहा कि शहीद दुर्गामल्ल व अन्य महापुरुषों ने समाज को जो पहचान दी है, उसे देखते हुए एक सांस्कृतिक परिषद बनाई जा रही है, ताकि उनके योगदान को प्रदेश स्तर पर जोड़ा जा सके। उन्होंने संस्कृति विभाग से हरितालिका तीज को अपने सालाना सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल करने को कहा। उन्होंने कहा कि इसका आयोजन समाज के लोग ही करेंगे, सरकार की भूमिका सहयोगी की होगी। कहा कि यह त्योहार बेटी बचाओ का संदेश देता है। 

गोर्खाली महिलाओं को पारम्परिक वेशभूषा में देखकर गद्गद सीएम ने कहा कि सभी महिलाएं अपनी संस्कृति को जीवंत कर रही हैं। वास्तव में महिलाएं ही प्रदेश के संस्कृति की मोबाइल राजदूत हैं। उन्होंने कहा कि गोर्खाली समाज में महिलाओं का सम्मान होता है। इसलिए यहां सुख का निवास है। हमें ऐसे समाज से प्रेरणा लेनी चाहिए। इससे पहले सीएम ने गोर्खाली नृत्यों की मनमोहन प्रस्तुति देखी। साथ ही बुजुर्ग और मेधावी छात्रों को सम्मानित किया। कार्यक्रम में मौजूद केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री कृष्णाराज ने तीज उत्सव कमेटी को केन्द्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से सहयोग देने का आश्वासन दिया। मौके पर भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी, टिहरी सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह, मसूरी विधायक गणेश जोशी, महिला आयोग अध्यक्ष सरोजनी कैंत्यूरा,सीएम के सांस्कृतिक सलाहकार रामकुमार वालिया मौजूद रहे।

गोर्खाली हरितालिका तीज की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत शिव वंदना से हुई। गुरांस सांस्कृतिक कला केन्द्र ने हिजो राती सपनै मा तीज को लहर...पर गोर्खाली नृत्य किया। अपना ग्रुप लोहारवाला ने छिन-छिन-छिन चुरा..., आनंद ग्रुप लच्छीवाला ने छोटो भयो जामा, बोलाई देऊ आमा..., शीतल ग्रुप रायवाला ने सिरै मा सिरबंदी टलकै टलक्यो..., हरिपुर ग्रुप ने यसपाली को तीज अहा कति राम्रो..., नील ग्रुप चामासारी ने झम-झम दरकियो पानी म त रमाये की शानदार प्रस्तुति दी।

खास रही तीज क्वीन प्रतियोगिता
हरितालिका तीज मेले की तीज क्वीन प्रतियोगिता में प्रियंका क्षेत्री पहले, निकिता थापा दूसरे व आकांक्षा तीसरे स्थान पर रहीं। तीज प्रिंसेज में साक्षी प्रथम, श्वेता थापा दूसरे और रेणुका लिम्बू तीसरे स्थान पर रहीं। 

देखें वीडियो

Courtesy: Dainik Hindustan